जीरे की खेती बर्बाद कर देंगे ये 3 रोग, किसान ऐसे करें बचाव, सस्ता और आसान तरीका – Cumin Farming

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जीरे की खेती Cumin Farming राजस्थान की एक प्रमुख फसल है। जीरा एक ऐसी फसल है, जो सभी घरों के रसोईघर में पाई जाती है. छौंका लगाना हो या सब्‍जी का स्‍वाद बढ़ाना हो, जीरा हर जगह काम आता है।

लेकिन जीरे की खेती Cumin Farming में रोग लगना किसानों के चेहरे पर चिंता की लकीर बन जाता है. ऐसे में एक्सपर्ट के जरिये हम आपको बताएंगे कि आप कम लागत में कैसे अपनी फसल को बचा सकते है और जीरे की उन्नत खेती कर सकते हैं.

कैसे लें जीरा की खेती Cumin Farming मे भरपूर उत्पादन?

किसान दिनेश कुमार बताते हैं कि जीरे की खेती Cumin Farming को विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में किया जा सकता है, चाहे वह मिट्टी रेतीली हो या चिकनी। हालांकि, वह सुझाव देते हैं कि चिकनी दोमट मिट्टी इसके लिए अधिक उपयुक्त होती है।

जीरा ठंडी जलवायु की फसल है, और इसकी बुआई नवम्बर के तीसरे सप्ताह से दिसम्बर के पहले सप्ताह तक की जाती है। इसके बाद जीरे की कटाई फरवरी-मार्च में होती है। जब बीज और पौधे भूरे रंग के हो जाएं और फसल पूरी तरह पक जाए, तो किसान त्वरित इसे काट लेते हैं।

पौधों को ध्यानपूर्वक सुखाने के बाद, उन्हें थ्रेसर से मैंडाई कर दाना अलग कर लिया जाता है। दाने को अच्छे से सुखाने के बाद ही उन्हें साफ बोरों में संग्रहित किया जाता है।

भरपूर लाभ के साथ रिस्की भी है जीरे की खेती

जीरे की खेती Cumin Farming में होने वाला लाभ के बारे में कृषि विशेषज्ञ डाॅ. रतनलाल शर्मा बताते हैं कि इसकी औसत उपज 7-8 क्विंटल जीरा प्रति हेक्टयर होती है। जीरे की खेती में लगभग 30 से 35 हजार रुपए प्रति हेक्टयर का खर्च आता है।

अगर जीरे के खेती Cumin Farming 100 रुपए प्रति किलो तक कीमत पर भी बनी रहती हैं, तो भी 40 से 45 हजार रुपए प्रति हेक्टयर का शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

लेकिन इसमें एक चुनौती भी है, क्योंकि जीरे की फसल Cumin Farming में लगने वाले रोगों के कारण किसान को कई बार भारी नुकसान भी झेलना पड़ता है।

जीरा की खेती बर्बाद कर सकते हैं ये 3 रोग


फसल में लगने वाले तीन प्रकार के रोगों के बारे में कृषि विशेषज्ञ डाॅ. रतनलाल शर्मा बताते हैं कि जीरे में प्रमुखतः तीन प्रकार के रोग पाए जाते हैं – छाचा रोग, झुलसा रोग, और उखटा या विल्ट रोग। ये रोग जीरे की खेती के लिए काफी हानिकारक हो सकते हैं।

इन रोगों को नियंत्रित करने के लिए, किसानों को प्रति हेक्टेयर 8 से 10 टन गोबर का खाद उपयोग करना चाहिए, जो कि एक सस्ता और प्रभावी रोग नियंत्रण का तरीका हो सकता है।

किसानों को यह ध्यान रखना चाहिए कि उन्हें खेतों की सफाई भी बनाए रखनी चाहिए और जितनी भी खरपतवार हो, उन्हें काट देना चाहिए। जब जीरे की फसल तैयार हो जाए, तो गर्मियों में खेत में समर डिप फ्लाइंग करना भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

जैविक जीरे की खेती है अच्छा विकल्प

जैविक जीरा की मांग में वृद्धि होने के कारण, कृषि विशेषज्ञ डाॅ. रतनलाल शर्मा बताते हैं कि किसान इसे अपने खेतों में सफलता से उगा सकते हैं। उनका कहना है कि 100 किलो सड़े हुए गोबर में 1 किलो ट्राइकोडर्मा डालकर उसे अच्छे से मिला लें और छांव में कुछ दिनों तक रखें।

इसके बाद, 10-15 दिनों तक पानी का छिड़काव करें। इससे गोबर पर एक हरी परत बनती है, जिसमें ट्राइकोड्रोमा फंगस होता है।

इस तैयार गोबर का उपयोग खेत में बुआई करते समय किया जा सकता है। इससे मिट्टी के सभी रोगों का नियंत्रण होता है, एक सस्ता और प्रभावी तरीका जो खेती को रोगों से बचाने में मदद करता है।

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